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ब्रह्मोस से 4 गुना ज्यादा रेंज, 3 गुना तेज रफ्तार… ‘प्रलय’ मिसाइल क्यों कहलाती है ब्रह्मास्त्र?

News Desk by News Desk
September 1, 2026
in इंडिया
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ब्रह्मोस से 4 गुना ज्यादा रेंज, 3 गुना तेज रफ्तार… ‘प्रलय’ मिसाइल क्यों कहलाती है ब्रह्मास्त्र?
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मुंबई 

भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को मॉडर्न वॉरफेयर के लिहाज से अपग्रेड कर रहा है. आर्मी, एयरफोर्स और नेवी को नई टेक्‍नोलॉजी से एडवांस किया जा रहा है. खासकर मिसाइल, फाइटर जेट और ड्रोन के सेगमेंट में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है. नेक्‍स्‍ट जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत पांचवीं के साथ ही छठी और उससे आगे की पीढ़ियों का लड़ाकू विमान डेवलप करने की योजना है. वहीं, मिसाइल डेवलपमेंट के क्षेत्र में भारत लगातार इतिहास रच रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हिन्‍द महासागर में तकरीबन 3000 किलोमीटर के लिए NOTAM जारी किया है. डिफेंस एक्‍सपर्ट का मानना है कि लंबी से मध्‍यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण किया जा सकता है. इस बीच, DRDO एक और योजना बना रहे है. इसके तहत लॉन्‍ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल के रेंज को दोगुना से ज्‍यादा किया जाएगा। 

दरअसल, भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. DRDO लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) के एक्‍सटेंडेड रेंज वाले वेरिएंट की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, जिसकी मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर तक ले जाने का लक्ष्य हो सकता है. हालांकि, इसको लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. मौजूदा LR-AShM 1,500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है. ऐसे में इसकी रेंज को दोगुने से भी अधिक बढ़ाकर 3,500 किलोमीटर तक ले जाने से यह सिस्‍टम केवल कोस्‍टल सिक्‍योरिटी तक सीमित न रहकर हिंद महासागर क्षेत्र में दूर मौजूद नौसैनिक खतरों के खिलाफ एक रणनीतिक हथियार बन सकती है. इसका इस्तेमाल जमीन से तैनात लॉन्चरों के जरिए समुद्र में काफी दूर मौजूद वॉरशिप और अन्य नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकेगा। 

हाइपरसोनिक टेक्‍नोलॉजी बनेगी अहम आधार
‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित एक्‍सटेंडेड रेंज वाला वेरिएंट मौजूदा LR-AShM की हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक पर आधारित हो सकता है. इस तकनीक में शुरुआती रॉकेट फेज मिसाइल को बेहद ऊंचाई और अत्यधिक गति तक पहुंचाते हैं. इसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड व्‍हीकल अलग होकर वायुमंडल की ऊपरी परतों में एयरोडायनामिक लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय करता है. रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल की गति करीब मैक-10 (तकरीबन 12348 किलोमीटर प्रति घंटा) तक पहुंचाने और हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान उसे नियंत्रित रखने के लिए रॉकेट मोटर, ईंधन, एयरोडायनामिक डिजाइन और फ्लाइट पाथ में बड़े बदलाव की जरूरत होगी. केवल अतिरिक्त ईंधन जोड़कर 3,500 किलोमीटर की रेंज हासिल करना संभव नहीं होगा. इसके लिए प्रोपल्‍सन सिस्‍टम और स्टेजिंग को भी नए सिरे से विकसित करना पड़ सकता है। 

LR-AShM बनाम ब्रह्मोस मिसाइल

 

LR-AShM मिसाइल ब्रह्मोस मिसाइल
मौजूदा क्षमता से दोगुनी से ज्यादा होगी रेंज: DRDO कथित तौर पर Long Range Anti-Ship Missile (LR-AShM) के एक एक्‍सटेंडेड वेरिएंट पर काम करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, जिसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक हो सकती है. मौजूदा LR-AShM की बताई गई क्षमता करीब 1,500 किलोमीटर है. 3,500 किमी की रेंज हासिल होने पर यह प्रणाली तटीय रक्षा से आगे बढ़कर समुद्र में काफी दूर मौजूद नौसैनिक ठिकानों और युद्धपोतों के खिलाफ रणनीतिक क्षमता प्रदान कर सकती है. 800-900 KM तक मारक क्षमता: भारत के एक्‍सटेंडेड घरेलू ब्रह्मोस वेरिएंट की ऑपरेशनल रेंज करीब 800 से 900 किलोमीटर तक बताई जाती है. वहीं, निर्यात संस्करण की रेंज करीब 290 किमी और Su-30MKI से लॉन्च होने वाले संस्करण की क्षमता करीब 450-500 किमी बताई गई है.
हाइपरसोनिक टेक्‍नोलॉजी: प्रस्तावित मिसाइल मौजूदा LR-AShM की हाइपरसोनिक boost-glide तकनीक को आगे बढ़ा सकती है. रॉकेट बूस्टर मिसाइल को बेहद ऊंचाई और करीब Mach 10 तक की गति देने के बाद अलग होगा, जिसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन वायुमंडल की ऊपरी परतों में एयरोडायनामिक लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय करेगा. इतनी दूरी हासिल करने के लिए रॉकेट मोटर, ईंधन, मिसाइल की संरचना और उड़ान पथ में बड़े बदलाव की जरूरत होगी. दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में शामिल: ब्रह्मोस करीब Mach 2.8 से Mach 3 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है. इसकी सुपरसोनिक स्पीड दुश्मन को प्रतिक्रिया के लिए बेहद कम समय देती है.
2,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान बड़ी चुनौती: 3,500 किलोमीटर की उड़ान के दौरान हाइपरसोनिक गति बनाए रखना सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक होगा. अत्यधिक गति पर वायुमंडलीय घर्षण से पैदा होने वाली गर्मी मिसाइल के बाहरी हिस्से का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक पहुंचा सकती है. ऐसे में DRDO को बेहतर heat shielding, उच्च तापमान सहने वाली सामग्री और अधिक एयरोडायनमिक डिजाइन विकसित करना होगा. तीनों सेनाओं के लिए अहम हथियार: ब्रह्मोस को जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च किया जा सकता है. भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमान से भी इसका एयर-लॉन्च्ड वेरिएंट इस्तेमाल किया जाता है.
NavIC और एडवांस नेविगेशन से सटीक निशाना साधने पर जोर: हजारों किलोमीटर दूर समुद्री लक्ष्य को सटीकता से निशाना बनाने के लिए बेहद एडवांस नेविगेशन सिस्‍टम जरूरी होगी. संभावित रूप से भारत के NavIC सैटेलाइट नेटवर्क के साथ मिसाइल के onboard sensors को जोड़ा जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौरान सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में ring-laser या fibre-optic gyroscopes जैसे आंतरिक नेविगेशन सिस्टम मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं. 200-300 किलोग्राम तक वॉरहेड: मिसाइल में करीब 200 से 300 किलोग्राम का पेलोड ले जाने की क्षमता बताई जाती है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पारंपरिक हमलों के लिए किया जाता है.
समुद्र में भारत की A2/AD क्षमता को मिल सकता है बड़ा बढ़ावा: अगर 3,500 किलोमीटर क्षमता वाला संस्करण विकसित होता है तो भारत जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइल के जरिए समुद्र में बहुत दूर मौजूद दुश्मन के नौसैनिक बेड़े को निशाना बना सकेगा. इससे भारत की Anti-Access/Area-Denial (A2/AD) क्षमता मजबूत होगी और मेन लैंड एवं स्‍ट्रैटजिक आइलैंड जोन के आसपास एक व्यापक सुरक्षा कवच तैयार हो सकता है. हालांकि, 3,500 किलोमीटर की रेंज फिलहाल एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है. दो चरणों वाला प्रोपल्शन सिस्टम: ब्रह्मोस में पहले चरण में सॉलिड-प्रोपेलेंट बूस्टर और इसके बाद लिक्विड रैमजेट इंजन काम करता है. यही तकनीक इसे लंबी दूरी तक तेज गति से लक्ष्य भेदने की क्षमता देती है.

2,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा टेम्‍प्रेचर चुनौती

हाइपरसोनिक स्‍पीड से लंबी दूरी तय करने में सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक अत्यधिक तापमान होगा. लंबे समय तक ऐसी गति पर उड़ान भरने से मिसाइल की बाहरी सतह पर तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच सकता है. ऐसे में DRDO को बेहतर हीट शील्डिंग, अधिक मजबूत स्‍ट्रक्‍चरल मैटेरियल और बेहतर एयरोडायनामिक डिजाइन पर काम करना होगा. इसके अलावा 3,500 किलोमीटर जैसी दूरी पर सटीक निशाना साधने के लिए अत्यंत विश्वसनीय नेविगेशन सिस्‍टम जरूरी होगी. ऐसे में स्वदेशी NavIC सैटेलाइट नेविगेशन सिस्‍टम को मिसाइल के गाइडेंस में शामिल किए जाने की संभावना है। 

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और प्रीसीजन अटैक

भविष्य की ऐसी मिसाइल को दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कैपेबिलिटी के बीच भी काम करने में सक्षम होना होगा. सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में आंतरिक नेविगेशन सेंसर, जैसे फाइबर ऑप्टिक या रिंग-लेजर जाइरोस्कोप, मिसाइल को रास्ते पर बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. यदि 3,500 किलोमीटर क्षमता वाली LR-AShM विकसित होती है तो इससे भारत की समुद्री रणनीति को बड़ा फायदा मिल सकता है. जमीन से ही इतनी लंबी दूरी तक नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता भारत को एक व्यापक एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल (A2/AD) क्षमता देगी. इससे भारतीय मेनलैंड और आइलैंड एरिया के आसपास दुश्मन के युद्धपोतों के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। 

यह क्षमता ब्रह्मोस जैसी मौजूदा मिसाइल प्रणालियों का स्थान लेने के बजाय उनकी पूरक हो सकती है. ब्रह्मोस अपेक्षाकृत कम दूरी पर तेज और प्रभावी हमला करने की क्षमता देता है, जबकि लंबी दूरी का हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड हथियार दूर समुद्र में मौजूद लक्ष्यों के खिलाफ अलग स्तर की क्षमता प्रदान करेगा. फिलहाल 3,500 किलोमीटर की रेंज को आधिकारिक रूप से स्वीकृत सैन्य क्षमता नहीं माना जा सकता. इसे हासिल करने के लिए कई वर्षों के डिजाइन, तकनीकी विकास, परीक्षण और मूल्यांकन की जरूरत होगी. यदि DRDO इस लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करता है, तो यह भारत की लंबी दूरी की मिसाइल और समुद्री युद्ध क्षमता में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि होगी। 

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