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नीदरलैंड ने भारत को लौटाए 1000 साल पुराने ताम्र पत्र, चोल इतिहास से जुड़ा खास कनेक्शन

News Desk by News Desk
May 21, 2026
in इंडिया
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नीदरलैंड ने भारत को लौटाए 1000 साल पुराने ताम्र पत्र, चोल इतिहास से जुड़ा खास कनेक्शन
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नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नीदरलैंड दौरे पर दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करते हुए 17 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. पीएम मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन के बीच रक्षा, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, व्यापार, शिक्षा और समुद्री सहयोग समेत कई अहम क्षेत्रों में साझेदारी के लिए सहमति बनी.

इसके अलावा नीदरलैंड की यात्रा में देश को एक बड़ी सांस्कृतिक और राजनयिक उपलब्धि भी हासिल हुई है. देश की करीब 1000 साल पुरानी विरासत वापस मिल गई है. नीदरलैंड की डच सरकार ने 11वीं सदी की अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं (Anaimangalam Copper Plates) को भारत को सौंप दिया है. आईए जानते हैं कि ‘लाइडेन प्लेट्स’ (Leiden Plates) के नाम से मशहूर 30 किलोग्राम की ये 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टिकाओं में क्या लिखा है? इनका तमिलनाडु और चोल वंश से क्या कनेक्शन है?

क्या हैं अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाएं: अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं को 'लीडेन प्लेट्स' भी कहा जाता है. ये 11वीं सदी की अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें हैं, जो दक्षिण भारत के गौरवशाली चोल राजवंश से संबंधित हैं. लगभग 30 किलोग्राम वजनी इन पट्टिकाओं में 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं, जो एक विशाल तांबे की अंगूठी से जुड़ी हुई हैं. इस पर चोल शासक राजेंद्र चोल प्रथम की शाही मुहर भी अंकित है. 1690 ईस्वी के आसपास इन्हें डच ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी भारत से नीदरलैंड ले गए थे. लंबे समय तक ये लीडेन विश्वविद्यालय (Leiden University) में सुरक्षित थीं. इसीलिए इनको इतिहासकार लीडेन प्लेट्स के नाम से भी जानते हैं.

अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं का क्या है इतिहास: अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाएं 1005 ईस्वी के आसपास चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम और उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल के दौरान जारी की गई थीं. ये पट्टिकाएं चोल शासकों द्वारा तमिलनाडु के नागापट्टनम में स्थित 'चूड़ामणि विहार' नामक बौद्ध मठ को अनैमंगलम गांव का राजस्व और कर दान करने के शाही आदेश को प्रमाणित करती हैं. यह मठ दक्षिण-पूर्व एशिया (जावा/सुमात्रा) के शैलेंद्र सम्राट द्वारा बनवाया गया था.

कैसी दिखती हैं अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाएं: अनैमंगलम पट्टिकाओं में 21 तांबे की प्लेटें शामिल हैं, जिन्हें एक कांस्य की अंगूठी से बांधा गया है. इस अंगूठी पर राजा राजेंद्र चोल प्रथम की मुहर लगी है, जिन्होंने 11वीं शताब्दी में शासन किया था. 5 प्लेटों पर संस्कृत में शिलालेख हैं और बाकी 16 प्लेट्स पर तमिल में शिलालेख हैं. संस्कृत में चोल राजाओं का इतिहास और वंशावली लिखी हुई है.

जबकि तमिल भाषा में दान और प्रशासनिक नियमों की जानकारी दी गई है. तमिल में प्रशासनिक डेटा, भूमि की सीमाएं, टैक्स छूट और स्थानीय शासन के नियम लिखे गए हैं. ये प्लेटें राजेंद्र चोल प्रथम की आधिकारिक शाही मुहर से बंद की गई हैं. इस मुहर पर चोल बाघ का प्रतीक, दो मछलियां (पांड्य प्रतीक) और एक धनुष (चेर प्रतीक) अंकित हैं, जो दक्षिण भारत पर चोलों की सर्वोच्चता को दर्शाते हैं.

ताम्र पट्टिकाओं पर क्या लिखा है: तांबे की 5 पट्टियां संस्कृत भाषा में हैं, जिन पर चोल राजवंश की वंशावली अंकित है. इसकी शुरुआत विष्णु की स्तुति और पौराणिक दिव्य (सूर्यवंशी) पूर्वजों के नामों से होती है. वहीं, तमिल भाग राजा राजराज प्रथम (शासनकाल: 985-1012 ई.) के शासनकाल से संबंधित है, जो राजेंद्र चोल प्रथम के पिता थे. शिलालेख में कहा गया है कि राजा राजराज प्रथम ने अपने शासनकाल के 21वें वर्ष में यह घोषणा की थी कि एक बौद्ध तीर्थस्थल (विहार) के निर्माण के लिए एक गांव (अनैमंगलम) का संपूर्ण राजस्व और उसकी भूमि दान में दी जाएगी.

चोलों की हिंदू धर्म के प्रति आस्था का प्रमाण हैं ताम्र पट्टिकाएं: यह शिलालेख चोलों की धार्मिक सहिष्णुता (एक हिंदू सम्राट द्वारा बौद्ध मठ को आर्थिक सहायता देना) का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है. इसके साथ ही यह श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक सुमात्रा, इंडोनेशिया) जिसके शासक ने इस मठ का निर्माण करवाया था, के साथ उनके गहरे समुद्री और भू-राजनीतिक संबंधों को भी उजागर करता है.

तांबे की 3 छोटी प्लेट्स में क्या लिखा: तीन तांबे की प्लेट्स भी एक कांस्य की अंगूठी से एक साथ बांधी हैं. इस पर राजा कुलोत्तुंग चोल प्रथम (जिन्होंने 1070 से 1120 तक शासन किया) की मुहर लगी है. इन पर तमिल में शिलालेख हैं. चोल प्लेटें, जो 1862 से लीडेन विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित हैं. जो दक्षिण भारत में शाही फरमानों (राजकीय आदेशों) के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. ये प्लेटें चोल और श्रीविजय साम्राज्यों के बीच संबंधों के बारे में ऐतिहासिक जानकारी भी देती हैं. इनका कुल वजन 30 किलोग्राम है.

चोल वंश का पूरा इतिहास खोलती हैं ये तांबे की प्लेट्स: इन तांबे की प्लेट्स को चोल साम्राज्य के सबसे मूल्यवान अभिलेखों में से एक माना जाता है, जिनमें इनके प्रशासन, कराधान, भूमि सुधार, सिंचाई प्रणालियों और व्यापारिक प्रथाओं का विस्तृत विवरण मिलता है. ये शिलालेख इस राजवंश की धार्मिक सद्भाव की भावना को भी उजागर करते हैं. इनमें दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय शासकों द्वारा स्थापित एक बौद्ध विहार के लिए 'अनैमंगलम' गांव को दान में दिए जाने का उल्लेख है.

इतिहासकारों का मानना ​​है कि ये प्लेट्स लगभग एक हजार साल पहले दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मौजूद मजबूत समुद्री, कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों का दुर्लभ प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. चोल शासन के स्वर्ण युग से जुड़ी ये पट्टिकाएं भारत के दो सबसे शक्तिशाली समुद्री सम्राटों- राजराज चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) और उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ईस्वी) के शासनकाल को दर्शाती हैं.

अनैमंगलम गांव का इतिहास: अनैमंगलम, भारत के तमिलनाडु राज्य में नागापट्टनम के पास स्थित एक गांव है. ऐतिहासिक दृष्टि से यह गांव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां सम्राट राजराजा चोल प्रथम ने 'चूड़ामणि विहार' नामक बौद्ध मठ को शाही भूमि दान में दी थी. इस मठ का निर्माण 1005 ईस्वी के आसपास श्रीविजय राजा श्री विजय मारविजयतुंगवर्मन ने करवाया था.

सम्राट राजराजा चोल प्रथम ने इस मठ के भरण-पोषण के लिए अनैमंगलम गांव से प्राप्त होने वाले राजस्व को अनुदान के रूप में दे दिया था. राजराजा के पुत्र, राजेंद्र चोल प्रथम ने इस अनुदान को औपचारिक रूप प्रदान करते हुए, इसे 24 ताम्र-पत्रों (21 बड़े और 3 छोटे) पर उत्कीर्ण करवाने का आदेश दिया.

चोल वंश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का प्रमाण हैं ताम्र पट्टिकाएं: लीडेन ताम्र-पत्रों (Leiden Plates) में इस गांव का उल्लेख होना, चोलों की अत्यंत सुव्यवस्थित कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का प्रमाण है. गांव के राजस्व को बौद्ध मठ को सौंपकर, चोल प्रशासन ने स्थानीय करों, कृषि-उपज और भूमि-राजस्व को सीधे तौर पर इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रखरखाव के लिए प्रभावी ढंग से उपयोग में लाया. यह घटना गांव-स्तरीय स्वशासन और भूमि-स्वामित्व की उन अत्यंत बारीकी से प्रलेखित प्रणालियों के अध्ययन के लिए एक ऐतिहासिक 'केस स्टडी' के रूप में कार्य करती है, जिनके लिए चोल राजवंश विश्व-प्रसिद्ध है.

अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं के नीदरलैंड पहुंचने की क्या है कहानी: राजेंद्र चोल प्रथम ने संस्कृत और तमिल में 24 ताम्रपत्रों (21 बड़े, 3 छोटे) पर उत्कीर्ण करवाकर अनुदान को औपचारिक रूप दिया था. ये चोल प्रतीक चिह्न वाले एक विशाल कांसे के छल्ले से बंधी हुई हैं. पट्टिकाएं खुदाई के दौरान संभवतः 1687 और 1700 के बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) द्वारा विजफ सिन्नेन किले के निर्माण और 'चीनी' पैगोडा स्थल के पुनर्निर्माण के दौरान मिली थीं.

खुदाई के समय, तमिलनाडु के नागापट्टनम पर VOC का कब्जा था और यह डच क्षेत्राधिकार के तहत एक व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता था. अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं को 17वीं सदी के अंत में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से तमिलनाडु के नागापट्टनम पर नियंत्रण करने के बाद भारत से बाहर निकाला गया था. ये वस्तुएं संभवतः 1712 में पादरी फ्लोरेंटियस कैम्पर और उनकी पत्नी (कैम्पर-केटिंग परिवार) द्वारा नीदरलैंड ले जाई गई थीं.

हालांकि, उन्हें ये कैसे प्राप्त हुईं, यह कहना मुश्किल है. लेकिन, कैम्पर-केटिंग परिवार के वंशजों ने 1862 में इन प्लेट्स को लीडेन विश्वविद्यालय को दान कर दिया था. जहां उनके रिश्तेदार, हेनड्रिक एरेंट हैमेकर, पहले पूर्वी भाषाओं के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे.

भारत को कैसे वापस मिली प्राचीन विरासत: भारत 2012 से ही अनैमंगलम प्लेट्स की वापसी के लिए औपचारिक रूप से प्रयास कर रहा था. 2023 में ये प्रयास तब और तेज हो गए, जब भारत ने UNESCO की सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी को बढ़ावा देने वाली अंतर-सरकारी समिति के के सामने अपना पक्ष रखा. इस बीच नीदरलैंड्स ने औपनिवेशिक काल के दौरान हटाई गई सांस्कृतिक वस्तुओं की वापसी के संबंध में एक प्रगतिशील राष्ट्रीय नीति अपनाई.

डच औपनिवेशिक संग्रह समिति ने भारत के दावे की समीक्षा की और आधिकारिक तौर पर यह निष्कर्ष निकाला कि 1000 साल पुरानी ये प्लेट्स दक्षिण भारत से उनके असली मालिकों की सहमति के बिना ले जाई गई थीं. समिति की सिफारिश के बाद, लीडेन विश्वविद्यालय के कार्यकारी बोर्ड ने इस कलाकृति की बिना शर्त वापसी को मंजूरी दे दी. साथ ही, भारत के लोगों के लिए इसके गहरे ऐतिहासिक, सभ्यतागत और भावनात्मक महत्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को सौंपी जाएंगी ताम्र प्लेट्स: चोल प्लेटें नई दिल्ली स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपी जाएंगी. ASI, भारत के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और देश में पुरातात्विक अनुसंधान तथा संरक्षण के लिए प्रमुख संस्था है. ASI ही यह तय करेगा कि इन वस्तुओं को भारत में आम जनता के लिए प्रदर्शित किया जाएगा या नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन के बीच हुआ यह औपचारिक हस्तांतरण, दोनों देशों के बीच "रणनीतिक साझेदारी" और आपसी सम्मान के एक नए युग का प्रतीक है.

नीदरलैंड के साथ भारत ने किए 17 समझौते: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीदरलैंड दौरे पर रक्षा, सेमीकंडक्टर निर्माण और ग्रीन एनर्जी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग के लिए 17 महत्वपूर्ण समझौते (MoUs) किए. साथ ही दोनों देशों के बीच संबंधों को 'रणनीतिक साझेदारी' (Strategic Partnership) के स्तर तक मजबूत किया गया. भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण (फैब) को बढ़ावा देने के लिए टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) और डच कंपनी एएसएमएल (ASML) के बीच समझौता हुआ है. साथ ही भारत और नीदरलैंड्स ने वर्ष 2026-2030 के लिए 'रणनीतिक साझेदारी रोडमैप' की शुरुआत की है, जिससे रक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग, स्पेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में साझा प्रगति होगी.

रणनीतिक साझेदारी का रोडमैप क्या है: भारत और नीदरलैंड ने 2026-2030 के लिए रणनीतिक साझेदारी रोडमैप को अपनाया है. इसके तहत व्यापार और निवेश, रक्षा सहयोग, राजनीतिक संवाद, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा संक्रमण, AI, क्वांटम तकनीक, स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु परिवर्तन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाया जाएगा. इससे दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी.

भारत-नीदरलैंड में रक्षा-सुरक्षा सहयोग पर जोर: पीएम मोदी और जेटन की वार्ता में रक्षा और सुरक्षा सहयोग को गहरा करने पर जोर दिया गया. दोनों देशों ने रक्षा मंत्रालयों के बीच संवाद, संयुक्त अनुसंधान, प्रशिक्षण और रक्षा औद्योगिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. साथ ही तकनीक हस्तांतरण, सह-विकास और सह-उत्पादन के जरिए रक्षा उपकरण निर्माण को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई. दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई. नीदरलैंड ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ भारत के प्रति समर्थन दोहराया.

सेमीकंडक्टर निर्माण में सहयोग पर बनी बात: पीएम मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री जेटन ने सेमीकंडक्टर निर्माण में सहयोग को भविष्य की रणनीतिक साझेदारी का अहम स्तंभ बताया. दोनों नेताओं ने धोलेरा में भारत के पहले फ्रंट-एंड सेमीकंडक्टर फैब के लिए टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और एएसएमएल के बीच हुए समझौते को ऐतिहासिक कदम बताया. इसके अलावा डच सेमीकंडक्टर कॉम्पिटेंस सेंटर और भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन के बीच सहयोग पर भी सहमति बनी.

ऊर्जा, जल प्रबंधन और ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर भी हुआ समझौता: हरित हाइड्रोजन विकास के लिए दोनों देशों ने भारत-नीदरलैंड रोडमैप तैयार किया. इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा और चक्रीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी. भारत और नीदरलैंड ने जल प्रबंधन के क्षेत्र में नमामि गंगे मिशन, शहरी नदी प्रबंधन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और गुजरात की कल्पसर परियोजना में तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने का फैसला किया.

व्यापार और निवेश को नई गति देने के लिए हुआ समझौता: पीएम मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री जेटन ने व्यापार और निवेश को बढ़ाने पर जोर दिया. दरअसल, नीदरलैंड भारत में चौथा सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है. इस यात्रा से दोनों देशों के बीच व्यापार को नई गति मिली, जो पहले से ही 27.8 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. दोनों देशों ने सीमा शुल्क सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे व्यापार प्रक्रियाएं आसान होंगी और वैध व्यापार को बढ़ावा मिलेगा.

कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा में भी सहयोग करेगा नीदरलैंड: दोनों देशों ने कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के लिए भी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके तहत डेयरी, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षित खेती में निवेश बढ़ाया जाएगा. बेंगलुरु में पशुपालन उत्कृष्टता केंद्र में भारत-डच डेयरी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने की घोषणा भी की गई.

स्वास्थ्य क्षेत्र में संक्रामक रोगों, डिजिटल हेल्थ, महिला स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान में सहयोग को आगे बढ़ाने पर दोनों देशों में सहमति बनी है. शिक्षा क्षेत्र में उच्च शिक्षा सहयोग समझौते और भारतीय तथा डच विश्वविद्यालयों के बीच नए शैक्षणिक सहयोग का भी स्वागत किया गया.

 

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