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मानसून से पहले बड़ा खतरा! 75 साल की सबसे गंभीर चेतावनी से करोड़ों लोगों की बढ़ी चिंता

News Desk by News Desk
May 21, 2026
in इंडिया
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मानसून से पहले बड़ा खतरा! 75 साल की सबसे गंभीर चेतावनी से करोड़ों लोगों की बढ़ी चिंता
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नई दिल्ली

 दुनियाभर में एक बार फिर अल नीनो (El Nino) को लेकर चिंता बढ़ने लगी है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार बनने वाला अल नीनो पिछले कई दशकों का सबसे खतरनाक संकट हो सकता है. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स और जलवायु एजेंसियों के मुताबिक, कुछ क्लाइमेट मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह अल नीनो 1950 के बाद दर्ज सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक बन सकता है. इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों में मौसम, खेती, पानी और अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। 

अल नीनो का नाम स्पेनिश भाषा के शब्द 'लिटिल बॉय' से पड़ा है. यह प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और हवाओं के पैटर्न में बदलाव से पैदा होने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है. आमतौर पर भूमध्य रेखा के पास चलने वाली ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उलटी दिशा में बहने लगती हैं तो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में गर्म पानी जमा होने लगता है. यही बदलाव पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है। 

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो ऐसे समय में बन रहा है जब धरती पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ज्यादा गर्म हो चुकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता तापमान अल नीनो के असर को और खतरनाक बना सकता है. इससे कहीं बाढ़ और चक्रवात बढ़ सकते हैं तो कहीं लंबे सूखे, भीषण गर्मी और जंगलों में आग जैसी घटनाएं तेज हो सकती हैं। 

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, कई मौसम मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाला अल नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े अल नीनो से भी ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है. 1997-98 का 'सुपर अल नीनो' दुनिया के इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में गिना जाता है, जिसने वैश्विक स्तर पर भारी आर्थिक तबाही मचाई थी। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक 1982-83 के अल नीनो से वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 4.1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था, जबकि 1997-98 के सुपर अल नीनो ने लगभग 5.7 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक क्षति पहुंचाई थी. इसका असर खेती, मछली पालन, ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य कीमतों, ट्रांसपोर्ट और बीमा सेक्टर तक पर पड़ा था. वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो सीधे किसी तूफान या आपदा को पैदा नहीं करता, लेकिन यह मौसमीय परिस्थितियों को इतना बदल देता है कि चरम घटनाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। 

भारत के लिए यह खतरा और भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि देश की कृषि और जल व्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही संकेत दे चुका है कि 2026 का मानसून अल नीनो के कारण कमजोर पड़ सकता है. अगर मानसून कमजोर रहा तो कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। 

भारत की करीब आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है. ऐसे में कम बारिश का असर फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और महंगाई पर पड़ सकता है. मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बारिश का वितरण भी असमान हो सकता है. कुछ इलाकों में लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है, जबकि कुछ जगहों पर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने से बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं. विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि भारत के शहर पहले से ही हीटवेव, फ्लैश फ्लड और पानी की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. अल नीनो इन संकटों को और गंभीर बना सकता है। 

इतिहास में भी अल नीनो के खतरनाक असर देखे जा चुके हैं. 1876-78 का महान अकाल (Great Famine) भी एक शक्तिशाली अल नीनो के दौरान आया था. उस समय भारत, चीन और ब्राजील समेत कई देशों में फसलें बर्बाद हो गई थीं और दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत भूख और बीमारियों से हुई थी। 

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि आज आधुनिक मौसम पूर्वानुमान, खाद्य भंडारण और आपदा प्रबंधन व्यवस्था पहले से काफी बेहतर है, इसलिए वैसी तबाही की आशंका कम है. लेकिन इसके बावजूद एक शक्तिशाली अल नीनो भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, बिजली की मांग और जल संकट पर भारी दबाव डाल सकता है. जलवायु एजेंसियां अब लगातार इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं. माना जा रहा है कि सर्दियों तक अल नीनो और मजबूत हो सकता है, जिसके चलते दुनिया के कई देशों ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। 

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