Friday, October 30, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Contact Us
Jagat Anandeshwar Times
Advertisement
  • होम
  • इंडिया
  • विश्व
  • राज्य
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • बिहार
    • दिल्ली NCR
    • महाराष्ट्र
    • राजस्थान
    • मध्य प्रदेश
    • हरियाणा
    • पंजाब
    • झारखंड
    • गुजरात
    • छतीसगढ़
    • हिमाचल प्रदेश
    • जम्मू & कश्मीर
  • राजनीति
  • बिजनेस
  • लाइफस्टाइल
    • धर्म
    • हेल्थ
    • फूड
    • फैशन
    • पर्यटन
  • मनोरंजन
  • खेल
  • टेक
  • ट्रेंडिंग
  • शिक्षा
  • ऑटो
  • अन्य
No Result
View All Result
  • होम
  • इंडिया
  • विश्व
  • राज्य
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • बिहार
    • दिल्ली NCR
    • महाराष्ट्र
    • राजस्थान
    • मध्य प्रदेश
    • हरियाणा
    • पंजाब
    • झारखंड
    • गुजरात
    • छतीसगढ़
    • हिमाचल प्रदेश
    • जम्मू & कश्मीर
  • राजनीति
  • बिजनेस
  • लाइफस्टाइल
    • धर्म
    • हेल्थ
    • फूड
    • फैशन
    • पर्यटन
  • मनोरंजन
  • खेल
  • टेक
  • ट्रेंडिंग
  • शिक्षा
  • ऑटो
  • अन्य
No Result
View All Result
Jagat Anandeshwar Times
No Result
View All Result
Home खेल

पैरा एशियन गेम्स में बेटियों ने शानदार प्रदर्शन कर मेडल जीते, देश का नाम रोशन किया

News Desk by News Desk
October 30, 2026
in खेल
0
पैरा एशियन गेम्स में बेटियों ने शानदार प्रदर्शन कर मेडल जीते, देश का नाम रोशन किया
0
SHARES
0
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

 नई दिल्‍ली
 हाल ही में जापान में संपन्न एशियन पैरा गेम्स में अपने अदम्य साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए देश की बेटियों ने इतिहास रच दिया। इस बार खिलाड़ियों ने पदक जीतने के साथ ही दुनिया के सामने नए मानक भी स्थापित किए। इन खिलाड़ियों की क्षमता सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इनकी कहानियां भी लोगों को प्रेरित करने वाली हैं। पदक जीतने वाली कुछ बेटियों की जीवनयात्रा पर दिनेश दीक्षित की रिपोर्ट…

1.शीतल ने पैरों से लिखी सफलता की कहानी
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ के पहाड़ों से निकली छोटी सी दिखने वाली शीतल देवी अपनी मेहनत और जज्बे से सफलता के उस आसमान पर पहुंच चुकी है, जहां पहाड़ों की ऊंचाइयां भी अब बौनी दिखने लगी हैं। वह कहती भी हैं कि कमजोरी हमारे मस्तिष्क में होती है, शरीर में नहीं, बस लक्ष्य संधान कर सही मेहनत करते चलो।

पैरा एशियाई खेलों में तीरंदाजी में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर शीतल ने यह साबित भी कर दिया। यह पहला अवसर नहीं है, पिछले पैरा एशियाई खेलों में भी उन्होंने अपने लिए यही पैमाना तय किया था और अब फिर उसे दोहरा भी दिया। इतना ही नहीं उन्होंने विश्व रिकार्ड की बराबरी की और नया एशियाई रिकार्ड भी रच डाला।

निरंतर प्रदर्शन दोहराने के दबाव पर शीतल ने कहा कि मैं पुरानी गलतियों के बारे में सोचकर दबाव में नहीं आती। आगे के निशाने पर लक्ष्य साधती हूं और यही सफलता का साधन भी है। शीतल का जीवन कभी भी आसान नहीं था। किश्तवाड़ के एक दूरदराज के गांव में जीवन हर दिन नई चुनौती पेश करता है।

बचपन में दुर्लभ बीमारी के कारण उनके दोनों हाथ अविकसित रह गए, पर शीतल ने हार नहीं मानी और पैरों से लिखना, खाना और अन्य कार्य करने सीखे। बचपन से ही पैरों के सहारे वह पेड़ों पर चढ़ जाती थीं। यही उनकी मानसिक मजबूती का प्रमाण भी है और यही अंदाज आगे उनके जीवन के साथ खेल में भी काम आया। उनका बचपन आसान नहीं था। परिवार उन्हें संभालता था, पर समाज से ताने उनकी नियति बन चुके थे।

हालांकि, इन सबका जवाब शीतल ने अपने खेल से दिया। सेना के अधिकारियों की उन पर नजर पड़ी और उनको कृत्रिम हाथ लगावाने का प्रयास किया पर वह सफल नहीं हो पाया। बाद में सेना के सहयोग से ही वह मां वैष्णोदेवी खेल केंद्र पहुंचीं। यहीं उन्होंने मुंह से पकड़कर और पैरों से धनुष थाम तीर चलाना सीखा।

निरंतर मेहनत और एकाग्रता ने उन्हें वह मुकाम दिला दिया, जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था। उनके पिता महेंद्र सिंह भी कहते हैं कि आज शीतल जिस मुकाम पर हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। यह सब उसने अपनी मेहनत और सरकार की मदद से हासिल किया साथ ही प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन का असर है कि वह हर चुनौती को पार करने में सफल हो रही है।

2.अभावों से जूझकर चमकीं संजना
सपने देखने से ज्यादा मुश्किल उन्हें हकीकत में बदलने का सफर होता है। खासकर तब, जब सुविधाओं का अभाव हो और हर कदम पर परिस्थितियों से लड़ना पड़े। झारखंड के लोहरदगा के शास्त्री नगर ढोढ़हा टोली की संजना कुमारी ने इन्हीं मुश्किलों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखा।

पैरा बैडमिंटन में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने अभाव ज्यादा दिनों तक रास्ता नहीं रोक सकते। उनकी यह उपलब्धि परिवार के त्याग, गुरु के मार्गदर्शन और एक बेटी के अदम्य साहस की कहानी है। अब संजना का सपना पैरालिंपिक में देश के लिए पदक जीतना है।

संजना कहती हैं, दिव्यांगजनों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी और खेल के क्षेत्र में सीमित अवसरों के बीच मैंने पैरा बैडमिंटन को अपना भविष्य बनाने का फैसला किया। खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का निर्णय भी मेरा था। शुरुआत में स्वजन को आश्चर्य हुआ और उन्हें मेरी सुरक्षा व भविष्य को लेकर चिंता भी, लेकिन मेरा जुनून कम नहीं हुआ।

आखिरकार मेरी मेहनत और दृढ़ निश्चय देखकर स्वजन ने भी साथ देने का फैसला किया। संजना कहती हैं, संघर्ष की शुरुआत रांची में प्रशिक्षण के दौरान काफी कठिन रही। मैं रोजाना प्रशिक्षण केंद्र के लिए अकेले निकलती थी और रात आठ बजे लौटती थी, लेकिन थकान और असुविधाओं के बीच भी लक्ष्य स्पष्ट रहा।

प्रशिक्षण के बाद हमने इंटरनेट मीडिया के माध्यम से लखनऊ में प्रशिक्षक गौरव खन्ना से संपर्क किया और स्वजन मुझे लखनऊ लेकर गए। वहां करीब दो लाख रुपये प्रतिमाह खर्च होने की जानकारी मिली। मजबूरी में मुझे वापस लौटना पड़ा। हालांकि, बाद में गौरव जी का फोन आया।

उन्होंने कहा कि परिवार रहने और खाने का खर्च उठाए, बाकी प्रशिक्षण और खेल से जुड़ी सुविधाओं के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। इस सहयोग ने मुझे आगे बढ़ने का अवसर दिया। पांच साल से अधिक समय से मेरी की जिंदगी का बड़ा हिस्सा प्रशिक्षण केंद्रों में बीत रहा है।

मैं घर आती भी हूं तो मुश्किल से एक-दो सप्ताह ही परिवार के साथ रह पाती हूं। मैंने अब तक 11 देशों में विभिन्न प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किए हैं। यदि सरकार और खेल संस्थाओं से और मदद मिले तो मैं और पदक जीतने का प्रयास करूंगी।

बेटियों के लिए संजना का संदेश है कि आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरें। अनुशासन बनाए रखें, मेहनत करें और हार से डरकर पीछे न हटें। खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सपनों को सच करने का माध्यम भी है।

3.बहन का सपना पूरा करने उतरीं कोकिला
जूडो में रजत पदक जीतने वाली दृष्टिबाधित खिलाड़ी कोकिला कौशिक ने संघर्षों के बीच अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। उनकी जिंदगी और खेल यात्रा अब फिल्म के माध्यम से भी लोगों के सामने आएगी। हरियाणा के हिसार की कोकिला की सफलता के पीछे परिवार का लंबा संघर्ष है।

उनकी बड़ी बहन सफलता जूडो खिलाड़ी थीं, लेकिन कंधे की चोट के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा। बहन के अधूरे सपने को आगे बढ़ाने के लिए कोकिला ने जूडो चुना। बेटी के करियर को आगे बढ़ाने के लिए पिता कृष्ण कुमार कौशिक ने करीब पचास लाख रुपये खर्च किए।

कोकिला की मां सुमन शर्मा एथलीट रही हैं, जबकि भाई कुशल कौशिक कुश्ती खिलाड़ी हैं। खेल से जुड़े पारिवारिक माहौल ने कोकिला के सपनों को जैसे पंख दे दिए। हालांकि, कोरोना के दौरान कोकिला के खेल पर खर्च बहुत बढ़ गया।

आर्थिक स्थिति बिगड़ने पर परिवार ने मकान बेचने का सोचा, लेकिन इसी दौरान खेल विभाग से साढ़े दस लाख रुपये का नकद पुरस्कार मिलने पर परिवार ने मकान बेचने का विचार छोड़ दिया। कोकिला कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में पदक हासिल कर चुकी हैं।

चुनौतियों और बाधाओं के बावजूद कोकिला का आगे बढ़ना उनके निरंतर प्रयास और परिवार के सहयोग का परिणाम है। बेटियों के लिए संदेश देते हुए कोकिला कहती हैं कि मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। मेहनत जारी रखनी चाहिए और आगे बढ़ने के अवसर तलाशने चाहिए।

4.सिमरन ने रचा स्वर्णिम इतिहास
समय से करीब ढाई महीने पहले जन्म, कमजोर दृष्टि और आर्थिक तंगी भी नहीं रोक सकी एथलीट सिमरन शर्मा की रफ्तार। सिमरन ने पैरा गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीते हैं। गाजियाबाद में जन्मीं सिमरन को जन्म के बाद करीब छह माह तक अस्पताल में रखा गया

सिमरन का सफर बताता है कि अवसर और सहयोग मिले तो शारीरिक चुनौतियां भी महिलाओं के सपनों की सीमा तय नहीं कर सकतीं। सिमरन कहती हैं, मेरा संघर्ष जन्म के साथ ही शुरू हो गया था। कमजोर दृष्टि के कारण बचपन से पढ़ाई और सामान्य गतिविधियों में भी परेशानी होती थी।

एथलेटिक्स में आने के बाद शरीर का संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती थी। कई बार मुश्किलें आईं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। पति गजेंद्र सिंह ने हर कदम पर साथ दिया। जब मैंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीता और पैरालिंपिक में देश के लिए पदक हासिल किया तो वह मेरे लिए बेहद भावुक पल था।

सबसे पहले मुझे अपने संघर्ष के दिन याद आए। फिर लगा कि वर्षों की मेहनत और त्याग सफल हुआ। सिमरन कहती हैं, खेल में आगे बढ़ने का सपना मेरा अपना था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान मेरी मुलाकात गजेंद्र सिंह से हुई। उन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचाना और मेरे सपने को पूरा करने में सहयोग किया।

आर्थिक चुनौतियों के बावजूद शादी के बाद पति (गजेंद्र) ने मेरे प्रशिक्षण के लिए अपनी जमा पूंजी तक लगा दी। मेरे लिए यह केवल खेल का सफर नहीं, बल्कि अपने सपने को हकीकत में बदलने की यात्रा है। मेरे सामने कई तरह की चुनौतियां थीं। कमजोर दृष्टि के कारण दौड़ते सामान्य खिलाड़ियों की तुलना में अधिक अभ्यास करना पड़ता था, पर पति ने मेरे साथ अभ्यास किया और तकनीक सुधारने में मदद की।

मैं बेटियों से कहना चाहती हूं कि अपने सपनों को छोटा मत समझिए। यदि आप खेल में आगे बढ़ना चाहती हैं तो नियमित अभ्यास करें, अनुशासन बनाए रखें और असफलताओं से घबराएं नहीं। शुरुआत में सुविधाओं की कमी या लोगों की नकारात्मक बातें परेशान कर सकती हैं, लेकिन अपने लक्ष्य पर ध्यान दें।

परिवार को भी बेटियों की प्रतिभा पर भरोसा करके उनका साथ देना चाहिए। बेटियों को अवसर और प्रोत्साहन मिले तो वे खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करने के साथ ही दूसरी लड़कियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती हैं।

5.संघर्षों को पछाड़ सुवर्णा ने हासिल किया स्वर्ण
दो वर्ष की उम्र में पोलियो से ग्रसित होने के बावजूद मूलरूप से नागपुर निवासी और वर्तमान में ग्रेटर नोएडा में रह रहीं सुवर्णा राज ने हार नहीं मानी। डिस्कस थ्रो में स्वर्ण हासिल करने वाली सुवर्णा ने पांचवीं कक्षा से ही खेलों की ओर कदम बढ़ा दिए थे। उन्होंने पावरलिफ्टिंग में भी हाथ आजमाया और दो बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते।

वर्ष 2008 में प्रदीप राज से विवाह के बाद वह दिल्ली में रहीं। इस दौरान किराये के मकान में रहकर पैरा स्पोर्ट्स की तैयारी करना आसान नहीं था। उन्होंने टेबल टेनिस से शुरुआत की और वर्ष 2016 में एथलेटिक्स में कदम रखा। सुवर्णा के संघर्ष का एक अहम पड़ाव वर्ष 2018 में पंचकूला में आयोजित राष्ट्रीय चैंपियनशिप रहा। खिलाड़ियों को ठहरने के लिए जमीन पर जगह दिए जाने का उन्होंने विरोध किया।

इसके बाद उन्हें खेलने से रोक दिया गया। इंडोनेशिया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में भी कैटेगरी बदलने के कारण उन्हें खेलने से रोक दिया गया, लेकिन उन्होंने खेल छोड़ने के बजाय तैयारी जारी रखी। सुवर्णा कहती हैं, स्वर्ण पदक जीतने का पल बहुत खास रहा। प्रतिद्वंद्वी के प्रदर्शन से घबराहट जरूर हुई, लेकिन स्वयं को संभाला और परिणाम भगवान पर छोड़ दिया।

खेल में आगे बढ़ने के लिए सुविधाओं की कमी के साथ अपने अधिकारों के लिए भी मुझे संघर्ष करना पड़ा, लेकिन मैंने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटाया। सुवर्णा कहती हैं कि बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। जब बेटियां हिम्मत दिखाती हैं तो उन्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।

खेल न केवल आत्मविश्वास बढ़ाता है, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने में भी मदद करता है। अब सुवर्णा की नजर पैरालिंपिक पर है। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनका शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एम.काम की डिग्री हासिल की। इसके बाद दिल्ली आने पर उन्होंने इग्नू से मास्टर इन सोशल वर्क की पढ़ाई की।

6.पोलियो को मात दी मोना ने
शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने वाली हरियाणा के नारनौल के एक छोटे से गांव कालबा की बहू मोना अग्रवाल की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की दास्तान नहीं है, बल्कि यह अटूट इच्छाशक्ति, मातृत्व के जज्बे और कभी न हार मानने वाले हौसले की वो मिसाल है, जो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है।

मात्र नौ महीने की उम्र में जब पोलियो ने मोना के पैरों की गति छीन ली थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यही लड़की एक दिन देश का नाम दुनिया में रोशन करेगी। संघर्ष की इस लड़ाई में मोना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। राजस्थान के सीकर की इस बेटी ने एमबीए करके कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बड़े पदों पर काम किया और खेल के मैदान में व्यस्त रहने के बावजूद साइकोलाजी की डिग्री हासिल की।

मोना कहती हैं, 2016-17 में इंटरनेट के जरिये मुझे पैरा गेम्स के बारे में पता चला। मैंने एथलेटिक्स से खेल जीवन की शुरुआत की और स्टेट चैंपियन बनी। इसके बाद सिटिंग वालीबाल खेला और न केवल राजस्थान टीम की कप्तान बनी, बल्कि देशभर में घूम-घूमकर लड़कियों को जागरूक किया और हर राज्य में टीम खड़ी की।

मोना सिटिंग वालीबाल की फाउंडर प्लेयर और नेशनल चैंपियन रहीं। खेल के मैदान में ही उनकी मुलाकात कालबा निवासी व्हीलचेयर बास्केटबाल और सिटिंग वालीबाल के राष्ट्रीय खिलाड़ी रविंद्र चौधरी से हुई। खेल से शुरू हुआ यह रिश्ता वर्ष 2018 में शादी के बंधन में बदल गया।

शादी और बच्चों की जिम्मेदारियां अमूमन खिलाड़ियों के करियर पर विराम लगा देती हैं, लेकिन मोना के लिए यह एक नई शुरुआत थी। बेटी आर्वी और बेटे आविक का पालन-पोषण करते हुए उन्होंने पहले पावरलिफ्टिंग में हाथ आजमाया। फिर निशानेबाजी की ओर रुख किया।

मोना ने शूटिंग रेंज पर उतरते ही सटीक निशाने लगाने शुरू कर दिए और अब पैरा गेम्स में मोना ने अपने पैरालिंपिक के कांस्य पदक को स्वर्ण पदक में बदल दिया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई पदक जीत चुकीं मोना आज उन सभी के लिए एक मिसाल हैं, जो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते हैं।

7.पैरालाइज हुईं पर पोडियम पहुंची स्वाति
2017 में मां बनने की खुशी के बीच स्वाति चौधरी की जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने उनके सामने अंधेरा खड़ा कर दिया। डिलीवरी के दौरान ही वह पैरालाइज हो गईं। गोद में नवजात बेटी थी, आंखों में सपने थे, लेकिन जिंदगी की राह बदल चुकी थी।

कभी अपने रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाली स्वाति ने शायद तब कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा थामकर मेडल जीतेंगी। पैरा गेम्स में तीरंदाजी में रजत पदक जीतने वाली स्वाति की कहानी सिर्फ खेल में सफलता की नहीं, बल्कि टूटती उम्मीदों को फिर से जोड़ने और खुद को दोबारा पहचानने की है।

स्वाति के लिए शारीरिक चुनौतियों के साथ मानसिक और आर्थिक परेशानियां भी कम नहीं थीं। पत्नी की देखभाल के लिए पति गौरव चौधरी ने नौकरी तक छोड़ दी। परिवार की जिम्मेदारियों और इलाज के खर्च के बीच हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता था।

करीब चार-पांच साल तक चले इस कठिन दौर में स्वाति डिप्रेशन तक पहुंच गईं। ऐसे में पति उनका सबसे बड़ा सहारा बने। स्वाति कहती हैं, कई बार लगता है कि पति ने मुझसे अधिक संघर्ष किया। मेरे जीवन में पैरा आर्चरी उम्मीद की नई किरण बनकर आई।

वह मानती कहती, मैंने आर्चरी को नहीं चुना, बल्कि आर्चरी ने मुझे चुना। छोटे-छोटे कामों के लिए भी मुझे दूसरों की मदद लेनी पड़ती थी। ऐसे में तीरंदाजी जैसे खेल में आगे बढ़ने की कल्पना आसान नहीं थी, लेकिन मेरे कोच विवेक चिकारा और सत्यदेव ने मुझ पर भरोसा जताया, जब मैं अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त नहीं थी। कोच के मार्गदर्शन और पति के सहयोग ने अभ्यास जारी रखने की ताकत दी।

धीरे-धीरे आत्मविश्वास लौटा और तीरंदाजी केवल खेल नहीं, बल्कि नई पहचान का माध्यम बन गई। स्वाति कहती हैं, पदक जीतना भावनाओं से भरा पल था। मुझे संघर्ष के वे दिन याद आए, जब भविष्य अनिश्चित था और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

यह पदक पति, परिवार और कोचों की मेहनत का प्रतीक है। स्वाति बेटियों को संदेश देती हैं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, अपने सपनों और आत्मविश्वास को कमजोर नहीं पड़ने देना। लोगों की बातों से प्रभावित होकर लक्ष्य नहीं छोड़ना। सफलता एक दिन में नहीं मिलती, लगातार प्रयास करने से रास्ते खुलते हैं।

8.संघर्षों को मात दे पदकवीर बनीं प्रीति
जीत के बाद जब तिरंगा लहराता है और गले में देश के लिए जीते पदक होते हैं तो वर्षों का संघर्ष आंखों से आंसू बनकर छलक पड़ता है। ये आंसू केवल खुशी के नहीं, बल्कि उन अनगिनत मुश्किलों, दर्द, मेहनत और त्याग की कहानी भी कहते हैं, जिनसे गुजरकर कोई खिलाड़ी सफलता के शिखर तक पहुंचता है।

प्रीति पाल के लिए भी वह पल भावुक कर देने वाला था, जब तिरंगा और पदक देखकर उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। प्रीति ने दौड़ में दो रजत पदक जीते हैं। उनकी सफलता की कहानी केवल पदकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हौसले, आत्मविश्वास और कभी हार न मानने के जज्बे की मिसाल भी है।

जीवन में आई कठिनाइयों ने उनके रास्ते में कई बाधाएं खड़ी कीं, लेकिन उन्होंने संघर्षों के आगे घुटने टेकने के बजाय उन्हें अपनी ताकत बनाया। प्रीति कहती हैं, मैंने आत्मविश्वास के दम पर हर चुनौती का सामना किया और अपने लक्ष्य से नजर नहीं हटने दी। खेल की दुनिया में कदम रखने का फैसला मेरा ही था।

हालांकि, इस सफर में कोच गजेंद्र सिंह के मार्गदर्शन और परिवार के प्रोत्साहन ने आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। मुझे शारीरिक चुनौतियों के साथ ही कठिन प्रशिक्षण, चोटों और कई बार असफलताओं से भी जूझना पड़ा, पर मैंने हार मानने के बजाय हर बार नए उत्साह के साथ अभ्यास किया।

वह कहती हैं कि तमाम बाधाओं के बावजूद इस मुकाम तक पहुंचना गर्व और खुशी का पल है। अपनी उपलब्धियों के जरिये प्रीति उन बेटियों को भी प्रेरित करना चाहती हैं, जो खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखती हैं।

प्रीति कहती हैं, आप अपने सपनों पर विश्वास रखें, पूरी मेहनत करें और कभी हार न मानें। सफलता का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से मंजिल हासिल की जा सकती है।

प्रीति की कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, यदि मन में लक्ष्य का संकल्प हो तो बाधाएं रास्ता नहीं रोक सकतीं। तिरंगे के सामने छलके उनके आंसू इसी विश्वास की गवाही देते हैं कि सच्ची मेहनत एक दिन जरूर रंग लाती है।

 

Previous Post

Alphabet के शेयरों में भारी गिरावट, 5 मिनट में 48 लाख करोड़ रुपये की वैल्यू साफ!

Next Post

PM किसान की 24वीं किस्त जारी, दिवाली से पहले किसानों को मोदी सरकार की सौगात

News Desk

News Desk

Next Post
PM किसान की 24वीं किस्त जारी, दिवाली से पहले किसानों को मोदी सरकार की सौगात

PM किसान की 24वीं किस्त जारी, दिवाली से पहले किसानों को मोदी सरकार की सौगात

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

  • Trending
  • Comments
  • Latest
टी-20 टीम में बड़ा बदलाव: सूर्यकुमार यादव की जगह श्रेयस अय्यर बने नए कप्तान

टी-20 टीम में बड़ा बदलाव: सूर्यकुमार यादव की जगह श्रेयस अय्यर बने नए कप्तान

June 5, 2026
Vedanta Demerger: वेदांता से निकलीं 4 नई कंपनियां, अनिल अग्रवाल का बड़ा दावा- हर बिजनेस बनेगा $100 अरब का दिग्गज

Vedanta Demerger: वेदांता से निकलीं 4 नई कंपनियां, अनिल अग्रवाल का बड़ा दावा- हर बिजनेस बनेगा $100 अरब का दिग्गज

June 15, 2026
यूपी चुनाव से पहले कांशीराम वाले अंदाज में लौटेंगी BSP चीफ मायावती, नोएडा से शुरू होगा चुनावी अभियान

यूपी चुनाव से पहले कांशीराम वाले अंदाज में लौटेंगी BSP चीफ मायावती, नोएडा से शुरू होगा चुनावी अभियान

November 25, 2025
मुंबई पुलिस ने नाकाम की बड़ी साजिश: मुहर्रम जुलूस में जहरीले कैप्सूल बांटता आरोपी गिरफ्तार

मुंबई पुलिस ने नाकाम की बड़ी साजिश: मुहर्रम जुलूस में जहरीले कैप्सूल बांटता आरोपी गिरफ्तार

June 28, 2026
राम मंदिर में ध्वजारोहण के क्षण भक्तिमय हुई अयोध्या, चारों दिशाओं में गूंजा जय श्रीराम, श्रद्धालुओं को देवलोक की अनुभूति

राम मंदिर में ध्वजारोहण के क्षण भक्तिमय हुई अयोध्या, चारों दिशाओं में गूंजा जय श्रीराम, श्रद्धालुओं को देवलोक की अनुभूति

0
यूपी चुनाव से पहले कांशीराम वाले अंदाज में लौटेंगी BSP चीफ मायावती, नोएडा से शुरू होगा चुनावी अभियान

यूपी चुनाव से पहले कांशीराम वाले अंदाज में लौटेंगी BSP चीफ मायावती, नोएडा से शुरू होगा चुनावी अभियान

0
मुझसे नहीं होगा ये काम, नोएडा में SIR की ड्यूटी से परेशान महिला टीचर ने BLO पद से दिया इस्तीफा

मुझसे नहीं होगा ये काम, नोएडा में SIR की ड्यूटी से परेशान महिला टीचर ने BLO पद से दिया इस्तीफा

0
मैं पूरे देश में बीजेपी की नींव हिला दूंगी, ममता बनर्जी की बीजेपी को बड़ी चेतावनी, SIR पर भड़कीं

मैं पूरे देश में बीजेपी की नींव हिला दूंगी, ममता बनर्जी की बीजेपी को बड़ी चेतावनी, SIR पर भड़कीं

0
अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

October 30, 2026
ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

October 30, 2026
‘हैरी पॉटर’ के फैंस के लिए खुशखबरी, क्रिसमस पर रिलीज होगी HBO की नई सीरीज

‘हैरी पॉटर’ के फैंस के लिए खुशखबरी, क्रिसमस पर रिलीज होगी HBO की नई सीरीज

October 30, 2026
श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘ईठा’ का ट्रेलर रिलीज, लावणी कलाकार के दमदार अवतार में आईं नजर

श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘ईठा’ का ट्रेलर रिलीज, लावणी कलाकार के दमदार अवतार में आईं नजर

October 30, 2026

Recent News

अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

October 30, 2026
ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

October 30, 2026
‘हैरी पॉटर’ के फैंस के लिए खुशखबरी, क्रिसमस पर रिलीज होगी HBO की नई सीरीज

‘हैरी पॉटर’ के फैंस के लिए खुशखबरी, क्रिसमस पर रिलीज होगी HBO की नई सीरीज

October 30, 2026
श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘ईठा’ का ट्रेलर रिलीज, लावणी कलाकार के दमदार अवतार में आईं नजर

श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘ईठा’ का ट्रेलर रिलीज, लावणी कलाकार के दमदार अवतार में आईं नजर

October 30, 2026

जगत आनंदेश्वर टाइम्स एक प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र है, जो निष्पक्ष, निर्भीक और जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित है। यह समाचार पत्र भारत सरकार के आरएनआई (RNI) एवं डीएवीपी (DAVP) से पंजीकृत है, जो इसकी विश्वसनीयता और प्रमाणिकता को दर्शाता है।

Follow Us

Browse by Category

  • अन्य
  • इंडिया
  • उत्तर प्रदेश
  • खेल
  • दिल्ली NCR
  • बिजनेस
  • बिहार
  • मनोरंजन
  • राजनीति
  • राज्य
  • लाइफस्टाइल
  • विश्व
  • शिक्षा

Recent News

अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

अलसी और नींबू से घर पर बनाएं नेचुरल स्किन जेल, झुर्रियों और फाइन लाइन्स से पाएं छुटकारा

October 30, 2026
ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

ठंडा-गर्म खाते ही दांतों में क्यों होती है झनझनाहट? जानें सेंसिटिविटी के कारण और बचाव

October 30, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Contact Us

© 2026 Jagat Anandeshwar Times - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • होम
  • इंडिया
  • विश्व
  • राज्य
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • बिहार
    • दिल्ली NCR
    • महाराष्ट्र
    • राजस्थान
    • मध्य प्रदेश
    • हरियाणा
    • पंजाब
    • झारखंड
    • गुजरात
    • छतीसगढ़
    • हिमाचल प्रदेश
    • जम्मू & कश्मीर
  • राजनीति
  • बिजनेस
  • लाइफस्टाइल
    • धर्म
    • हेल्थ
    • फूड
    • फैशन
    • पर्यटन
  • मनोरंजन
  • खेल
  • टेक
  • ट्रेंडिंग
  • शिक्षा
  • ऑटो
  • अन्य

© 2026 Jagat Anandeshwar Times - All Rights Reserved.