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Home खेल

फीफा वर्ल्ड कप में भारत कब खेलेगा? 1950 में मिला था मौका, फिर क्यों टूट गया सपना?

News Desk by News Desk
June 16, 2026
in खेल
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फीफा वर्ल्ड कप में भारत कब खेलेगा? 1950 में मिला था मौका, फिर क्यों टूट गया सपना?
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नई दिल्ली
फीफा वर्ल्ड कप 2026 संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), कनाडा और मेक्सिको की सह-मेजबानी में खेला जा रहा है. दुनिया के 48 देश फुटबॉल के इस महाकुंभ में शिरकत कर रहे हैं, मगर अपना भारत वर्ल्ड कप से एक बार फिर गायब है. जब भी फीफा वर्ल्ड कप का आगाज होता है, तो भारत के करोड़ों प्रशंसक उस जुनून से इस टूर्नामेंट को देखते हैं, मानो उनका देश भी इसमें भाग ले रहा हो. सोशल मीडिया पर बहस होती है, घरों में पसंदीदा टीमों के लिए जश्न मनाया जाता है और पूरा देश फुटबॉल के रंग में रंग जाता है. कोई लियोनेल मेसी की टीम को चीयर करता नजर आता है, तो कोई रोनाल्डो के देश पुर्तगाल का समर्थक होता है. लेकिन इस उत्साह के बीच एक सवाल हर बार सामने आ खड़ा होता है- आखिर सबसे बड़ी आबादी

वाला देश भारत फीफा वर्ल्ड कप कब खेलेगा?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि भारत का फुटबॉल से रिश्ता नया नहीं है. देश में लाखों बच्चे फुटबॉल खेलते हैं, करोड़ों लोग इसे देखते हैं और कई राज्यों में यह खेल क्रिकेट जितना ही लोकप्रिय है. इसके बावजूद भारतीय टीम आज तक विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े मंच तक नहीं पहुंच सकी. फीफा के सदस्य देशों की संख्या 211 है, जिसमें भारत भी शामिल है. आपको जानकर ये दुख होगा कि भारत फिलहाल फीफा रैंकिंग में 138वें स्थान पर हैं. केप वर्डे और कुराकाओ जैसे छोटे देश भी फीफा वर्ल्ड कप में खेल रहे हैं. भारत फीफा वर्ल्ड कप तो कभी खेल नहीं पाया, एशिया में भी उसकी स्थिति अच्छी नहीं हैं. भारतीय टीम अगले साल होने वाले एएफसी एशियन कप के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर सकी, जो किसी शर्मिंदगी से कम नहीं है.

वैसे भारत फीफा वर्ल्ड कप खेलने के सबसे करीब 1950 में पहुंचा था. ब्राजील में आयोजित उस वर्ल्ड कप के लिए भारत ने बिना कोई क्वालफाइंग मैच खेले ही क्वालिफाई कर लिया था. एशियाई क्वालिफाइंग ग्रुप की टीमें- बर्मा (अब म्यांमार), इंडोनेशिया और फिलीपींस प्रतियोगिता से हट गई थीं, जिससे भारत को तब डायरेक्ट एंट्री मिल गई. स्वीडन, इटली और पराग्वे जैसी टीमों के साथ भारत को ग्रुप में रखा गया था, लेकिन टीम ब्राजील पहुंच ही नहीं सकी.

लंबे समय तक यह कहानी सुनाई जाती रही कि फीफा ने भारतीय खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने की अनुमति नहीं दी, इसलिए टीम ने टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया. हालांकि पूरा सच यह नहीं था. असल वजह आर्थिक और प्रशासनिक थी. आजादी के बाद देश संसाधनों की कमी से जूझ रहा था. टीम को ब्राजील भेजने में काफी ज्यादा खर्च लगता और पर्याप्त तैयारी का समय भी नहीं था. साथ ही उस समय अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ओलंपिक को वर्ल्ड कप से ज्यादा महत्वपूर्ण मानता था. नतीजा यह हुआ कि भारत ने सबसे बड़ा मौका गंवा दिया.

1950 के बाद भारत ने कई बार फीफा वर्ल्ड कप क्वालिफायर में हिस्सा लिया, लेकिन कभी भी अंतिम स्टेज तक नहीं पहुंच सका. कई बार टीम ने उम्मीद जगाई, लेकिन निर्णायक मुकाबलों में अनुभव और गुणवत्ता की कमी साफ नजर आई. बाइचुंग भूटिया, सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ियों ने 21वीं सदी में भारतीय फुटबॉल को नई पहचान दी. टीम ने एशियाई स्तर पर कुछ अच्छी जीतें भी दर्ज कीं, लेकिन जापान, साउथ कोरिया, ईरान, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों से भारत अब भी काफी पीछे है.

एक समय भारतीय टीम कम से कम एशिया में तो अपना दबदबा बनाने में जरूर सफल रही थी. 1962 के जकार्ता एशियन गेम्स ने भारतीय टीम ने साउथ कोरिया को 2-1 के अंतर से हराकर गोल्ड मेडल जीता था. चुन्नी गोस्वामी, पीके बनर्जी और तुलसीदास बलराम की तिकड़ी की वजह से ही भारतीय टीम ने ये ऐतिहासिक सफलता अर्जित की थी. फिर बैंकॉक में आयोजित 1970 के एशियाई खेलों में भारतीय फुटबॉल टीम ब्रॉन्ज मेडल जीतने में सफल रही. इसके बाद से जो भारतीय फुटबॉल में गिरावट आनी शुरू हुई, वो अब तक जारी है.

क्या क्रिकेट जिम्मेदार है?
भारत के फुटबॉल वर्ल्ड कप से दूर रहने की बड़ी वजह क्रिकेट को माना जाता है, लेकिन पूरी कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है. यह सच है कि क्रिकेट भारतीय स्पोर्ट्स पर लगभग एकाधिकार रखता है. पैसा, प्रायोजक, मीडिया कवरेज और लोकप्रियता- सब कुछ क्रिकेट के इर्द-गिर्द घूमता है. ऐसे में कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी फुटबॉल की बजाय क्रिकेट चुन लेते हैं. लेकिन सिर्फ क्रिकेट को दोष देना भी गलत होगा. जापान, ऑस्ट्रेलिया और साउथ कोरिया जैसे देशों में दूसरे खेल भी लोकप्रिय हैं, फिर भी उन्होंने मजबूत फुटबॉल संस्कृति विकसित की है. ऑस्ट्रेलिया तो क्रिकेट में भी हमेशा से एक मजबूत शक्ति रहा है. असली फर्क योजनाओं, निवेश और दीर्घकालिक सोच का है. भारतीय फुटबॉल लंबे समय से प्रशासनिक विवादों से भी जूझता रहा है. एआईएफएफ में नेतृत्व परिवर्तन, कानूनी विवाद और नीतिगत अस्थिरता के कारण कई योजनाएं अधूरी रह गईं. यहां तक इंडियन सुपर लीग (ISL) का 12वां सीजन किसी तरह इस बार आयोजित करवाया जा सका.

आखिर कहां पिछड़ गया भारत?
भारतीय फुटबॉल में सबसे बड़ी समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि सिस्टम की कमी है. दुनिया की सफल फुटबॉल टीमें खिलाड़ियों को 8-10 साल की उम्र से तैयार करना शुरू कर देती हैं. उनके पास मजबूत स्कूल लीग, स्थानीय टूर्नामेंट, हजारों कोच और आधुनिक एकेडमी होती हैं. बच्चे हर साल दर्जनों प्रतिस्पर्धी मैच खेलते हैं और धीरे-धीरे प्रोफेशनल लेवल तक पहुंचते हैं. भारत में यह ढांचा अभी भी कमजोर है. कई राज्यों में बच्चों को नियमित रूप से प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका तक नहीं मिलता. कोचिंग की कमी, कमजोर स्काउटिंग सिस्टम और सीमित सुविधाएं भी बड़ी बाधाएं हैं. बिना स्थिर और पेशेवर प्रशासन के किसी भी देश के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना मुश्किल है.

वैसे उम्मीद की किरण अभी भी बाकी है. 2026 से फीफा वर्ल्ड कप में टीमों की संख्या 32 से बढ़ाकर 48 कर दी गई. इससे एशियाई देशों के लिए अधिक स्लॉट उपलब्ध हुए हैं. सैद्धांतिक रूप से भारत की संभावनाएं पहले से बेहतर हुई हैं, लेकिन सिर्फ अतिरिक्त स्थान मिल जाने से बात नहीं बनेगी. भारत को स्कूल स्तर पर फुटबॉल को बढ़ावा देना होगा, हजारों नए कोच तैयार करने होंगे, जमीनी स्तर पर प्रतियोगिताओं का जाल बिछाना होगा और 15-20 साल की लंबी योजना पर काम करना होगा.

फीफा वर्ल्ड कप सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों का सपना है. मोरक्को, क्रोएशिया, जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों ने दिखाया है कि मजबूत सिस्टम और सही दिशा में काम करके कोई भी देश फुटबॉल की दुनिया में बड़ा मुकाम हासिल कर सकता है. भारत के पास आबादी है, प्रतिभा है और फुटबॉल के लिए जुनून भी है. मजबूत ढांचे और लगातार निवेश की बस कमी है.

अब सवाल यह नहीं है कि भारत कभी फीफा वर्ल्ड कप खेलेगा या नहीं. असली सवाल यह है कि उस सपने को हकीकत बनाने के लिए देश कितनी गंभीरता से काम करता है. अगर सही फैसले लिए गए, तो वह दिन दूर नहीं होगा जब फीफा वर्ल्ड कप में भारत सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि मैदान पर मुकाबला करता नजर आएगा.

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